हज़ारों ज़ख़्म खा के भी न तड़पा हाए मजबूरी बस इक तस्वीर-ए-बे-ताबी सरापा तेरा बिस्मिल था

“Enduring a thousand wounds, it could not even writhe—alas, what helplessness! From head to toe, your slaughtered prey was but a painted portrait of unrest.”

— ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
अर्थ

अफ़सोस कि इतनी लाचारी थी कि हज़ारों ज़ख़्म खाने के बाद भी वह तड़प न सका। तुम्हारा घायल शिकार सिर से पैर तक बस बेचैनी की एक मूरत बनकर रह गया था।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ की उस बेबसी का बयान है जहाँ दिल पर हज़ार घाव सहकर भी वह तड़प तक नहीं सका। शायर ने 'तस्वीर-ए-बेताबी' का बेहद ख़ूबसूरत विरोधाभास पेश किया है—जैसे कोई तस्वीर बाहर से तो बिल्कुल शांत और बेजान दिखती है, मगर उसके भीतर बेचैनी और दर्द का तूफ़ान छुपा हो। यह महबूब के सितम पर खामोशी से अपनी जान लुटा देने वाले आशिक़ की असीम लाचारी और वफ़ा की दास्तान है।

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