मुझ को सूझा भी तो क्या मजज़ूब वहशत का इलाज मैं ने दिल वाबस्ता-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ कर दिया

“What a cure occurred to me, seized by frenzy and despair: I bound my captive heart fast to her disheveled hair.”

— ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
अर्थ

ऐ मजज़ूब, मुझे अपनी दीवानगी और घबराहट का क्या अजीब इलाज सूझा कि मैंने अपने दिल को महबूब की बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों से बाँध दिया।

विस्तार

यहाँ शायर बड़े प्यारे अंदाज़ में एक मीठा तंज़ करते हैं कि उन्होंने अपने दिल के पागलपन और बेचैनी का कैसा अनोखा इलाज ढूँढा! अपने बेज़ार मन को सुकून देने के लिए उन्होंने दिल को महबूब की बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों से बाँध दिया। शायरी में 'ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ' ख़ुद उलझन और बेचैनी का प्रतीक है, यानी दिल की दीवानगी को शांत करने के चक्कर में आशिक़ ने ख़ुद को एक और ख़ूबसूरत आफ़त के हवाले कर दिया।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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