जाँ सुपुर्द-ए-तीर और ख़ूँ सर्फ़-ए-पैकाँ कर दिया पास जो कुछ था मिरे सब नज़्र-ए-मेहमाँ कर दिया

“My life surrendered to the arrow, my blood spent upon the arrowhead; all that I possessed was offered in homage to the guest.”

— ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
अर्थ

मैंने अपनी जान तीर के हवाले कर दी और अपना ख़ून तीर की नोक पर बहा दिया; मेरे पास जो कुछ भी था, वह सब मेहमान की ख़ातिर भेंट कर दिया।

विस्तार

यहाँ शायर ने महबूब के तीर यानी उसके दिए ज़ख़्म को एक अज़ीज़ मेहमान का दर्जा दिया है। हमारे यहाँ मेहमान के इस्तक़बाल में कुछ भी बचा कर नहीं रखा जाता, और आशिक़ ने भी ठीक यही किया—उसने तीर को अपनी जान और उसकी नोक को अपना सारा लहू सौंप दिया। यह शेर इश्क़ के उस जज़्बे को दिखाता है जहाँ आशिक़ दर्द और फ़ना को भी पूरी मोहब्बत और रज़ामंदी से गले लगाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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