“Bear me away now, O restlessness, toward the placeless realm; this world of possibilities is worthy of ecstasy no more.”
हे मेरी बेचैनी, अब मुझे स्थान-रहित लोक (ला-मकाँ) की ओर ले चल, क्योंकि यह भौतिक संसार अब रूहानी मस्ती और वज्द के योग्य नहीं रहा।
इस शेर में शायर अपनी बेचैनी (इज़्तिराब) को कोई अज़ाब नहीं, बल्कि एक रहबर मानकर पुकारता है कि वह उसे इस भौतिक दुनिया की सीमाओं से परे ले जाए। उसे लगता है कि यह मुमकिन दुनिया (आलम-ए-इमकाँ) अब इतनी खोखली हो चुकी है कि यहाँ रूहानी मस्ती और बेख़ुदी (वज्द) के लिए कोई जगह नहीं बची। यह शेर सांसारिक सीमाओं से ऊबकर उस असीम, बे-ठिकाना दुनिया (ला-मकाँ) में खो जाने की एक गहरी सूफ़ी तड़प को बयां करता है।
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