“When has the wilderness not fled before my frenzy? When has the desert ever failed to keep far away from me?”
रेगिस्तान कब मेरे पागलपन और वहशत से भागता नहीं रहा, और कब वह मुझसे दूर-दूर नहीं रहा?
उर्दू शायरी में दीवाना हमेशा सहरा और बयाबाँ (रेगिस्तान) की ओर भागता है, लेकिन इस शेर में शायर ने इस रवायत को उलटकर कमाल कर दिया है। उनका जूनून और वहशत इतनी बेकाबू है कि खुद वीरानी और बयाबाँ भी उनसे डरकर दूर भागते नज़र आते हैं। यह शेर उस बेपनाह अकेलेपन और दीवानगी को बयां करता है, जिसकी शिद्दत के आगे सहरा की विशालता भी छोटी पड़ जाती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
