કદી ખાવા મળે લાડુ, કદી ખાવા પડે ઝાડુ, રગશિયું દેહનું ગાડું, ઉપર ભગવી ધજા કેવી? ૬

“Sometimes laddoos to eat, sometimes one must sweep the dust,This dragging cart, the body, how can it fly a saffron flag?”

— कलाપી
अर्थ

कभी खाने को लड्डू मिलते हैं, तो कभी झाड़ू लगाना पड़ता है। यह शरीर एक घिसटती हुई गाड़ी जैसा है, तो इस पर भगवा झंडा कैसा?

विस्तार

यह दोहा जीवन की अनिश्चित यात्रा को खूबसूरती से समझाता है। यह कहता है, 'कभी स्वादिष्ट लड्डू खाने को मिलते हैं, तो कभी झाड़ू लगाने की नौबत आती है।' यह सुख-दुख, सौभाग्य और चुनौतियों के बीच लगातार बदलते जीवन को दर्शाता है। हमारे शरीर की तुलना 'घिसटती हुई गाड़ी' से की गई है, जो इसकी नश्वरता और जीवन भर के संघर्षों पर ज़ोर देती है। इन बदलती परिस्थितियों और शरीर की स्वाभाविक सीमाओं को देखते हुए, कवि पूछते हैं, 'इस पर भगवा ध्वजा कैसे लहरा सकती है?' भगवा ध्वजा अक्सर वैराग्य या आध्यात्मिक शुद्धता का प्रतीक होती है। यह पंक्तियाँ विचार करती हैं कि जब जीवन की वास्तविकताएँ हमें इतने विविध अनुभवों से गुज़ारती हैं और शरीर स्वयं इतना पार्थिव और नश्वर है, तो कोई सच्चे वैराग्य या आध्यात्मिक ज्ञान का दावा कैसे कर सकता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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