ફિકર ઘૂંટી કરી ફાકી, તમન્ના શી હવે બાકી? શરીરે ત્યાગની કફની, ચડાવી ત્યાં કજા કેવી? ર

“Having ground and swallowed all worries, what desires now remain?With the shroud of renunciation donned on the body, how can fate then affect it?”

— कलाપી
अर्थ

जब सभी चिंताओं को पीसकर निगल लिया है, तो अब कौन सी इच्छाएँ बाकी हैं? शरीर पर त्याग का कफ़न चढ़ा लिया है, तो फिर भाग्य कैसे प्रभावित कर सकता है?

विस्तार

यह खूबसूरत दोहा एक गहरी आध्यात्मिक स्थिति की बात करता है। यह बताता है कि एक बार जब हम अपनी सभी चिंताओं और फिक्रों को सचमुच 'निगल' लेते हैं और उन पर काबू पा लेते हैं, तो फिर दुनियावी इच्छाओं के लिए कोई जगह नहीं बचती। जब हम अपने शरीर पर 'त्याग की कफनी' पहन लेते हैं – यानी सभी मोह और भौतिक चीजों का त्याग कर देते हैं – तो फिर भला कुछ भी, यहाँ तक कि मृत्यु भी, हमें कैसे नुकसान पहुँचा सकती है? यह भय और सांसारिक बंधनों से मुक्ति पाने का एक शक्तिशाली संदेश है, जो वैराग्य और आंतरिक शांति को अपनाने से मिलता है। अपनी चिंताओं और इच्छाओं को त्यागकर, हम जीवन की सभी चुनौतियों, यहाँ तक कि अंतिम चुनौती से भी अप्रभावित हो जाते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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