छिन ही चढ़े छिन ही उतरे , सो तो प्रेम न होय। अघट प्रेम पिंजरे बसे , प्रेम कहावे सोय॥

“Rising for a moment, falling for a moment, that is not love. Love resides in the cage of continuous devotion; love only speaks from there.”

— कबीर
अर्थ

जो पल भर के लिए ऊपर उठता और पल भर में नीचे आ जाता है, वह प्रेम नहीं है। सच्चा प्रेम निरंतर भक्ति के पिंजरे में रहता है; प्रेम केवल वहीं से बोलता है।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ समझाते हैं कि जो प्रेम पल-पल बदलता रहता है, कभी उत्साह से भरा तो कभी उदास, वह सच्चा प्रेम नहीं है। असली मोहब्बत तो ऐसी होती है जो एक बार किसी के दिल में बस जाए तो फिर वहीं टिकी रहती है, जैसे कोई पक्षी प्रेम के पिंजरे को अपना घर बना ले। यह हमें बताता है कि सच्चे प्रेम में स्थिरता और अटूट निष्ठा होती है, न कि क्षणिक चढ़ाव और उतार।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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