“When I was (in love), there was no Guru; now that I have the Guru, I am (in love). The path of love is too narrow for two to enter.”
जब मैं प्रेम में था, तब मुझे गुरु की आवश्यकता नहीं थी; लेकिन अब जब मुझे गुरु मिल गए हैं, तो मैं प्रेम में हूँ। यह प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें दो लोग एक साथ नहीं समा सकते।
कबीर दास जी इस दोहे में समझाते हैं कि जब हमारे भीतर 'मैं' यानी अहंकार होता है, तब हम सच्चे गुरु या ईश्वर को जान नहीं पाते। लेकिन जब गुरु की कृपा से ज्ञान मिलता है, तो हमारा अहंकार मिट जाता है और हम केवल ईश्वर के हो जाते हैं। प्रेम का मार्ग इतना संकरा है कि उस पर अहंकार और ईश्वर, दोनों एक साथ नहीं चल सकते। यह हमें अपने 'स्व' को मिटाकर प्रभु से एकाकार होने का सुंदर संदेश देता है।
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
