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जब मैं था तब गुरु नहीं , अब गुरु हैं मैं नाय। प्रेम गली अति साँकरी , ता मे दो न समाय॥ 82॥

When I was, there was no Guru; now that there is a Guru, I am a stranger. The path of love is too narrow; neither can two reside in it.

कबीर
अर्थ

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय। प्रेम गली अति साँकरी, ता मे दो न समाय। इस दोहे का अर्थ है कि जब मेरा कोई गुरु नहीं था, तब मैं स्वयं में था, लेकिन अब गुरु के आने से मैं स्वयं में नहीं रहा। प्रेम का मार्ग बहुत संकरा है, जिसमें दो लोग एक साथ नहीं रह सकते।

विस्तार

नमस्ते! कबीर साहब यहाँ समझा रहे हैं कि जब हमारे अंदर 'मैं' यानी अहंकार भरा होता है, तब हमें सच्चे गुरु या ईश्वर की अनुभूति नहीं होती। लेकिन जब गुरु का ज्ञान या ईश्वर की उपस्थिति महसूस होती है, तो यह 'मैं' अपने आप गायब हो जाता है, जैसे उसका कोई अस्तित्व ही न हो। वो कहते हैं कि प्रेम की गली इतनी संकरी है, इतनी बारीक है कि उसमें 'मैं' और 'ईश्वर' (या गुरु) दोनों एक साथ नहीं रह सकते। यानी, अगर हमें सच्चा प्रेम या ज्ञान पाना है, तो अपने अहंकार को मिटाना ही होगा, तभी हम एकाकार हो सकते हैं।

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