गुरु लोभ शिष लालची , दोनों खेले दाँव। दोनों बूड़े बापुरे , चढ़ि पाथर की नाँव॥

“The master and the greedy student, both played with the stakes, Both aged men, who boarded the boat of stone (death).”

— कबीर
अर्थ

गुरु और लालची शिष्य ने दोनों दाँव खेले। दोनों बूढ़े व्यक्ति पत्थर की नाव में चढ़ गए।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ कितनी ख़ूबसूरती से समझाते हैं कि जब गुरु और शिष्य दोनों ही लालच के भँवर में फँस जाते हैं, तो उनका अंजाम क्या होता है। वे दोनों इस दुनिया की मायावी दौलत और प्रतिष्ठा के दाँव-पेंच में उलझकर, एक ऐसी नाव में सवार हो जाते हैं जो पत्थर की बनी है। ज़ाहिर है, पत्थर की नाव भला कैसे पार लगाएगी? कबीर साहब हमें याद दिला रहे हैं कि ऐसे सांसारिक लोभ और मोह से भरी यात्रा का अंत केवल विनाश या आध्यात्मिक पतन ही है।

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