भौ सागर की त्रास तेक , गुरु की पकड़ो बाँहि। गुरु बिन कौन उबारसी , भौ जल धारा माँहि॥ 459॥
“O bee, from the fear of the ocean, hold the Guru's arm. Who else can rescue you from the flowing water?”
— कबीर
अर्थ
हे भौं, सागर के भय से गुरु का सहारा पकड़ो। गुरु के बिना कौन इस बहती जलधारा से पार लगाएगा।
विस्तार
यह दोहा हमें समझाता है कि इस संसार रूपी भवसागर में हम एक छोटी सी मधुमक्खी जैसे हैं, जो जीवन की लहरों में डरती है। कबीर जी कहते हैं कि जब चारों तरफ़ माया और भय का अथाह सागर हो, तो केवल गुरु का हाथ ही सहारा दे सकता है। गुरु ही हमें इस भौतिक संसार की अनिश्चित धाराओं और मोह-माया से पार लगाकर सही मार्ग दिखाते हैं। उनके बिना, इस गहरे जल से कौन हमें बचा सकता है?
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