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तबही गुरु प्रिय बैन कहि , शीष बढ़ी चित प्रीत। ते रहियें गुरु सनमुखाँ कबहूँ न दीजै पीठ॥ 456॥

At that moment, the Guru spoke dear words, and my heart was filled with affection. Oh Guru, never let me leave your side.

कबीर
अर्थ

उस समय गुरु ने प्रिय वचन कहे, और मेरा हृदय प्रेम से भर गया। हे गुरु, मुझे कभी आपके सान्निध्य से दूर न जाने दें।

विस्तार

यह दोहा गुरु के मधुर वचनों को सुनकर शिष्य के हृदय में उमड़ते प्रेम और भक्ति को खूबसूरती से दर्शाता है। यह केवल शारीरिक रूप से गुरु के साथ रहने की प्रार्थना नहीं, बल्कि उनके ज्ञान और उपस्थिति पर गहरी आध्यात्मिक निर्भरता का भाव है। शिष्य गुरु के सान्निध्य में हमेशा बने रहना चाहता है, मानो गुरु के शब्द ही उसके जीवन का आधार हों। यह चिरस्थायी साथ की चाह शिष्य और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के बीच के गहरे, परिवर्तनकारी बंधन को उजागर करती है।

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