नीर पियावत क्या फिरै , सायर घर-घर बारि। जो त्रिषावन्त होइगा , सो पीवेगा झखमारि॥ 426॥ कबीर सिरजन हार बिन , मेरा हित न कोइ। गुण औगुण बिहणै नहीं , स्वारथ बँधी लोइ॥

“What use is wandering, if the water is withheld? The thirsty one will surely drink from the wound. Oh, Kabir, without the garland of the head, no one can help me. They do not praise or commend, but bind me with selfish motives.”

— कबीर
अर्थ

शायर का क्या लाभ, अगर पानी मिले नहीं, और प्यासा व्यक्ति घाव से ही पीएगा। कबीर कहते हैं कि सिर का हार न होने पर कोई मेरा भला नहीं कर सकता, वे गुणगान नहीं करते, बल्कि स्वार्थ से मुझे बाँधते हैं।

विस्तार

अरे वाह, कबीरदास जी इन दोहों में कितनी गहरी बात कह रहे हैं! पहले दोहे में वे समझाते हैं कि सच्ची प्यास लगी हो तो इंसान किसी भी तरह अपनी तृषा शांत कर लेगा, व्यर्थ में इधर-उधर भटकने से क्या फायदा। दूसरे दोहे में वे कहते हैं कि परमात्मा के सहारे के बिना, हमें अक्सर स्वार्थी लोग घेर लेते हैं। ऐसे लोग हमारे गुण-अवगुण नहीं देखते, बल्कि अपने मतलब के लिए हमें उलझाए रखते हैं।

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