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खूंदन तौ धरती सहै , बाढ़ सहै बनराइ। कुसबद तौ हरिजन सहै , दूजै सह्या न जाइ॥ 425॥

The earth bears the fragrance, it bears the flood's rage; / But the beloved bears the devotee, whom none else can bear.

कबीर
अर्थ

अर्थात्, जिस प्रकार धरती सुगंध और बाढ़ दोनों को सहन करती है, उसी प्रकार कुसबद (प्रियतम) हरिजन (भक्त) को सहन करता है, जिसे कोई और सहन नहीं कर सकता।

विस्तार

कबीर साहब इस दोहे में बताते हैं कि सहनशीलता क्या होती है! जैसे धरती हर तरह की चोट सह लेती है और बाढ़ का प्रलयकारी वेग जंगल झेल लेता है, ठीक वैसे ही केवल हरि का सच्चा भक्त ही लोगों के कटु वचन और निंदा को धीरज से सह पाता है। यह उसकी सच्ची भक्ति और अंदरूनी शांति का प्रमाण है, जो और किसी के लिए कर पाना लगभग असंभव है।

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