“When coolness is known, it remains within the atmosphere. When the fire leaves, the air remains pure; the word cannot be described.”
जब शीतलता का ज्ञान होता है, तो वह वातावरण में बनी रहती है। जब अग्नि चली जाती है, तो हवा शुद्ध बनी रहती है; इस अवस्था का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
कबीर दास जी इस दोहे में मन की शांति और परम सत्य को समझाने के लिए प्रकृति के सुंदर उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि जब मन में सच्ची शीतलता यानी आंतरिक शांति आ जाती है, तो वह पूरे भीतर समा जाती है। जब अहंकार और पक्षपात की अग्नि शांत हो जाती है, तब आत्मा पूरी तरह से शुद्ध हो जाती है। यह परम अवस्था इतनी गहरी है कि इसे शब्दों में पूरी तरह से व्यक्त करना असंभव है, इसे केवल अनुभव किया जा सकता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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