कामी लज्जा ना करै , न माहें अहिलाद। नींद न माँगै साँथरा , भूख न माँगे स्वाद॥ — कबीर

कामी लज्जा ना करै , न माहें अहिलाद। नींद न माँगै साँथरा , भूख न माँगे स्वाद॥

“The ardent one does not feel shame, nor does he fear the woman. The sleeper does not ask for companionship, nor does the hungry one ask for taste.”

— कबीर

अर्थ

कामी को लज्जा नहीं होती, और न ही वह स्त्री से डरता है। नींद में भी वह साथ नहीं मांगता, और न ही भूख में स्वाद की इच्छा करता है।

विस्तार

कबीरदास जी इस दोहे में बताते हैं कि जब इंसान किसी गहरे प्रेम या भक्ति में डूब जाता है, तो उसे दुनियावी शर्म या सुख-दुख की परवाह नहीं रहती। जिस तरह सच्ची नींद आने पर बिस्तर की फ़िक्र नहीं होती और तेज़ भूख लगने पर स्वाद नहीं देखा जाता, उसी तरह सच्चा प्रेमी या साधक भी बाहरी दिखावों और इच्छाओं से ऊपर उठ जाता है। यह हमें सिखाता है कि जब मन किसी चीज़ में पूरी तरह लीन हो जाता है, तो छोटी-मोटी चीज़ें बेमानी हो जाती हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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