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ग्यानी मूल गँवाइया , आपण भये करना। ताथैं संसारी भला , मन मैं रहै डरना॥ 289॥

Oh, knowledge's root, you have lost it; you are bound to this world. Yet, in the mind, there remains fear of the transient world.

कबीर
अर्थ

हे ज्ञानी मूल, तुमने अपना ज्ञान खो दिया; तुम इस संसार से बंध गए हो। फिर भी, मन में संसार के नश्वर होने का भय बना हुआ है।

विस्तार

कबीर यहाँ एक अद्भुत विरोधाभास समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति भी ज्ञान की मूल जड़ को भूलकर संसार के बंधनों में उलझ जाता है। ऐसे में, वह सामान्य संसारी व्यक्ति ही बेहतर है, जिसके मन में कम से कम इस नश्वर दुनिया या अदृश्य शक्ति का डर तो बना रहता है। यह डर ही कहीं न कहीं उसे अपनी असलियत और जीवन की क्षणभंगुरता से जोड़े रखता है।

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