कामी अभी न भावई , विष ही कौं ले सोधि। कुबुध्दि न जीव की , भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि॥ — कबीर

कामी अभी न भावई , विष ही कौं ले सोधि। कुबुध्दि न जीव की , भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि॥

“O lustful one, do not yet desire, nor take this poison. What is the life of a being, that it should remain in such rapture?”

— कबीर

अर्थ

हे कामी, अभी इच्छा मत करो और यह विष मत ग्रहण करो। किसी प्राणी का जीवन क्या है कि वह ऐसे परमानंद में रहे?

विस्तार

कबीर यहाँ हमें समझा रहे हैं कि इंद्रियों की क्षणिक वासनाएँ और मोह एक ज़हर की तरह हैं, जिनसे हमें दूर रहना चाहिए। वे कहते हैं कि ये सांसारिक आकर्षण सिर्फ़ मन को भ्रमित करते हैं और आत्मा को मैला करते हैं। इस दुनियावी मायाजाल में फंसे रहना जीवन का असली मकसद नहीं है, बल्कि स्थायी आत्मज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा आनंद है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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