हाँसी खैलो हरि मिलै , कौण सहै षरसान। काम क्रोध त्रिष्णं तजै , तोहि मिलै भगवान॥ 264॥ जा कारणि में ढ़ूँढ़ती , सनमुख मिलिया आइ। धन मैली पिव ऊजला , लागि न सकौं पाइ॥

“O Hari, play with laughter, who can bear the deep misery? Abandon lust, anger, and greed, and you will meet the Lord. O, who searches in the world, and meets the Sunmukhi. The wealth that is soiled and glorious, cannot be attained.”

— कबीर
अर्थ

हरि से हँसकर खेलना चाहिए, क्योंकि कौन इतना गहरा दुख सह सकता है। काम, क्रोध और तृष्णा का त्याग कर, तुम्हें भगवान मिलेंगे। जो संसार में खोजती है, उसे सनमुखि मिल जाते हैं। वह धन जो मैला और उज्ज्वल है, उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता।

विस्तार

यह दोहा हमें समझाता है कि ईश्वर से मिलन गहरी उदासी में नहीं, बल्कि मन की प्रसन्नता और आनंद में छिपा है। कबीरदास जी कहते हैं कि हमें काम, क्रोध और लालच जैसी बुराइयों को त्यागना होगा, तभी हम प्रभु को पा सकेंगे। अक्सर जिसे हम बाहर ढूँढ़ते हैं, वह हमारे सामने ही होता है, पर हमारी अपनी मन की मलिनता (अशुद्धियाँ) हमें उस निर्मल प्रभु तक पहुँचने से रोक देती है, जैसे एक मैली आत्मा शुद्ध प्रियतम के चरणों को छूने में संकोच करती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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