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प्रेमभाव एक चाहिए , भेष अनेक बजाय। चाहे घर में बास कर , चाहे बन मे जाय॥ 214॥

A loving feeling is what is needed, with many disguises to employ. Whether dwelling in a home, or roaming in the forest.

कबीर
अर्थ

प्रेम का भाव एक होना चाहिए, और इसके लिए अनेक वेश धारण करना चाहिए। चाहे वह घर में रहना पसंद करे, या जंगल में भटकना।

विस्तार

यह दोहा हमें समझाता है कि असली चीज़ केवल प्रेमभाव है, यानी दिल में प्यार होना। आप चाहे कितने ही अलग-अलग भेष क्यों न अपना लें, चाहे घर-गृहस्थी में रहें या वन में जाकर तपस्या करें, बाहरी रूप-रंग और स्थान कोई मायने नहीं रखते। कबीर साहेब बड़े सरल तरीके से कहते हैं कि सच्चा प्रेम भीतर का भाव है, जो हर जगह और हर स्थिति में एक समान चमकता है।

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