“Whose face has no brow, nor beauty, nor ugliness; from whose scent the barbet is drawn, such an incomparable element.”
जिसका मुख न माथा हो, न रूप कुरूप। जिसकी सुगंध से पामरा आकर्षित हो, ऐसा तत्व अनूप।
कबीरदास जी यहां उस निराकार सत्ता की बात कर रहे हैं जिसका कोई चेहरा या स्वरूप नहीं, जो सुंदरता और कुरूपता के बंधनों से बिल्कुल परे है। वह हमें समझाते हैं कि जिस तरह एक साधारण पक्षी भी उस अदृश्य सुगंध (बास) से खिंचा चला आता है, उसी तरह हमारी आत्मा उस अद्वितीय दिव्य उपस्थिति की ओर सहज ही आकर्षित होती है। यह अलौकिक 'तत्व' इतना अनमोल और बेजोड़ है कि इसे किसी भौतिक मापदंड से समझा नहीं जा सकता, केवल भीतर से महसूस किया जा सकता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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