को छूटौ इहिं जाल परि , कत फुरंग अकुलाय। ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै , त्यों-त्यों उरझत जाय॥

“How can I escape this net of yours, O foreign one? As much as I desire to worship you, so much you withdraw.”

— कबीर
अर्थ

हे विदेशी! मैं इस जाल से कैसे छूटूँ? जैसे-जैसे मैं तुम्हें पूजने की इच्छा करता हूँ, वैसे-वैसे तुम दूर होती जाती हो।

विस्तार

कबीर यहाँ जीवन को एक ऐसे बंधनकारी जाल के रूप में देखते हैं, जिससे निकलना बहुत मुश्किल है। वे बाहरी मोह-माया को एक ऐसे प्रियतम से जोड़ते हैं, जिससे जितनी करीब आने की कोशिश करो, वह उतना ही दूर होता जाता है। यह दोहा मन की चंचल प्रकृति और माया के अटूट चक्र को बड़े ही खूबसूरती से दर्शाता है, जहाँ हम जितना सुलझने की कोशिश करते हैं, उतना ही उलझते चले जाते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठ
हिंदी अर्थ
अंग्रेज़ी अर्थ
हिंदी विस्तार
अंग्रेज़ी विस्तार
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

← Prev55 / 10