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आस पराई राखता , खाया घर का खेत। और्न को पथ बोधता , मुख में डारे रेत॥ 141॥

Keeping foreign affection, it ate the family's field. And it taught the path of the stranger, casting sand into the mouth.

कबीर
अर्थ

पराया आस रखना, और घर का खेत खाना। अजनबी का मार्ग दिखाना, और मुँह में रेत डालना।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ समझा रहे हैं कि जब हम दूसरों की उम्मीदों या बाहरी चीज़ों पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते हैं, तो यह अपने ही घर के खेत को खा जाने जैसा है। इसका मतलब है कि हम अपनी ही जड़ों को, अपनी स्थिरता को नुकसान पहुँचाते हैं। यह ऐसा है जैसे कोई दूसरों को तो सही रास्ता दिखाए, पर खुद अपने मुँह में रेत भर ले—यानी व्यर्थ की मेहनत करे और अंत में कुछ भी सार्थक हासिल न कर पाए। असली खुशी और शांति तो अपने अंदर ही खोजने से मिलती है, बाहर की परवाह करने से नहीं।

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