आस पराई राख्त , खाया घर का खेत। औरन को प्त बोधता , मुख में पड़ रेत॥ 102॥
“The nearby branch has eaten the home's field; the stranger understands the bond, but sand settles in the mouth.”
— कबीर
अर्थ
पराए आस (आशा) ने घर का खेत खा लिया; औरन को बंधन (समझ) आता है, पर मुख में रेत पड़ जाती है।
विस्तार
कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि जब हम दूसरों पर या बाहरी चीज़ों पर बहुत ज़्यादा निर्भर करते हैं, तो यह अपने ही भीतर की शांति और संपदा को खा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पराई टहनी अपने ही खेत को उजाड़ दे। हम दूसरों को तो ज्ञान की बातें सिखाते हैं, पर यदि खुद हमारे कर्म शुद्ध न हों, तो हमारे मुख में रेत पड़ जाती है—यानी हमारी अपनी बातें बेअसर और खोखली महसूस होती हैं। यह समझाता है कि सच्ची समझ और शांति भीतर से ही आती है, बाहरी दिखावे से नहीं।
