“The nearby branch has eaten the home's field; the stranger understands the bond, but sand settles in the mouth.”
पराए आस (आशा) ने घर का खेत खा लिया; औरन को बंधन (समझ) आता है, पर मुख में रेत पड़ जाती है।
कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि जब हम दूसरों पर या बाहरी चीज़ों पर बहुत ज़्यादा निर्भर करते हैं, तो यह अपने ही भीतर की शांति और संपदा को खा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पराई टहनी अपने ही खेत को उजाड़ दे। हम दूसरों को तो ज्ञान की बातें सिखाते हैं, पर यदि खुद हमारे कर्म शुद्ध न हों, तो हमारे मुख में रेत पड़ जाती है—यानी हमारी अपनी बातें बेअसर और खोखली महसूस होती हैं। यह समझाता है कि सच्ची समझ और शांति भीतर से ही आती है, बाहरी दिखावे से नहीं।
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