मुझे दे रहे हैं तसल्लियाँ वो हर एक ताज़ा पयाम से — जिगर मुरादाबादी

मुझे दे रहे हैं तसल्लियाँ वो हर एक ताज़ा पयाम से कभी आ के मंज़र-ए-आम पर कभी हट के मंज़र-ए-आम से

“They offer me solace and hope with every message anew, now stepping into the public gaze, now slipping away from view.”

— जिगर मुरादाबादी

अर्थ

वे मुझे हर नए संदेश से तसल्ली दे रहे हैं, कभी सबके सामने आकर और कभी नज़रों से ओझल होकर।

विस्तार

इस शेर में इश्क़ के उस दिलकश और तड़पाने वाले खेल का ज़िक्र है, जहाँ महबूब हर बार एक नया दिलासा देकर उम्मीद बाँधे रखता है। वो कभी सरेआम सामने आकर दिल को सुकून दे जाते हैं, तो कभी ज़माने के डर या नज़ाकत की वजह से नज़रों से ओझल हो जाते हैं। यह आँख-मिचौनी आशिक़ को इंतज़ार और बेकरारी के ऐसे मीठे चक्रव्यूह में उलझाए रखती है, जिससे निकलना नामुमकिन हो जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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