ग़ज़ल
किया तअ'ज्जुब कि मिरी रूह-ए-रवाँ तक पहुँचे
کیا تعجب کہ مری روح رواں تک پہنچے
यह ग़ज़ल अंतर्मन की गहरी वेदना और कवि के गीतों की मूक भाषा को समझने की चुनौती को रेखांकित करती है। इसमें पीड़ा को दबाए रखने के संयम और उस दमित दर्द के फूट पड़ने पर उत्पन्न होने वाले असीमित प्रभाव को संजीदगी से बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
किया तअ'ज्जुब कि मिरी रूह-ए-रवाँ तक पहुँचे
पहले कोई मिरे नग़्मों की ज़बाँ तक पहुँचे
2
जब हर इक शोरिश-ए-ग़म ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे
फिर ख़ुदा जाने ये हंगामा कहाँ तक पहुँचे
3
आँख तक दिल से न आए न ज़बाँ तक पहुँचे
बात जिस की है उसी आफ़त-ए-जाँ तक पहुँचे
4
तू जहाँ पर था बहुत पहले वहीं आज भी है
देख रिंदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ास कहाँ तक पहुँचे
5
जो ज़माने को बुरा कहते हैं ख़ुद हैं वो बुरे
काश ये बात तिरे गोश-ए-गिराँ तक पहुँचे
6
बढ़ के रिंदों ने क़दम हज़रत-ए-वाइ'ज़ के लिए
गिरते पड़ते जो दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे
7
तू मिरे हाल-ए-परेशाँ पे बहुत तंज़ न कर
अपने गेसू भी ज़रा देख कहाँ तक पहुँचे
8
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
9
इश्क़ की चोट दिखाने में कहीं आती है
कुछ इशारे थे कि जो लफ़्ज़-ओ-बयाँ तक पहुँचे
10
जल्वे बेताब थे जो पर्दा-ए-फ़ितरत में 'जिगर'
ख़ुद तड़प कर मिरी चश्म-ए-निगराँ तक पहुँचे
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