ग़ज़ल
जेहल-ए-ख़िरद ने दिन ये दिखाए
جہل خرد نے دن یہ دکھائے
यह ग़ज़ल समाज में मानवीय मूल्यों और विवेक के पतन पर गहरा क्षोभ व्यक्त करती है, जहाँ वास्तविक इंसानियत सिमटती जा रही है और केवल खोखले साए बाकी रह गए हैं। इसमें तीव्र अलगाव, अंतर्मन की उदासी और अस्तित्व के उस दर्द को उजागर किया गया है जहाँ मनुष्य को अपने ग़म में भी कोई तसल्ली नहीं मिलती।
Source: rekhta · HI
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1
जेहल-ए-ख़िरद ने दिन ये दिखाए
घट गए इंसाँ बढ़ गए साए
2
हाए वो क्यूँकर दिल बहलाए
ग़म भी जिस को रास न आए
3
ज़िद पर इश्क़ अगर आ जाए
पानी छिड़के आग लगाए
4
दिल पे कुछ ऐसा वक़्त पड़ा है
भागे लेकिन राह न पाए
5
कैसा मजाज़ और कैसी हक़ीक़त
अपने ही जल्वे अपने ही साए
6
झूटी है हर एक मसर्रत
रूह अगर तस्कीन न पाए
7
कार-ए-ज़माना जितना जितना
बनता जाए बिगड़ता जाए
8
ज़ब्त-ए-मोहब्बत शर्त-ए-मोहब्बत
जी है कि ज़ालिम उमडा आए
9
हुस्न वही है हुस्न जो ज़ालिम
हाथ लगाए हाथ न आए
10
नग़्मा वही है नग़्मा कि जिस को
रूह सुने और रूह सुनाए
11
राह-ए-जुनूँ आसान हुई है
ज़ुल्फ़ ओ मिज़ा के साए साए
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