ग़ज़ल
इश्क़ में ला-जवाब हैं हम लोग
عشق میں لا جواب ہیں ہم لوگ
यह ग़ज़ल सच्चे प्रेमियों के स्वाभिमान, बेबाक अंदाज़ और उनकी आत्मिक श्रेष्ठता को प्रस्तुत करती है। शायर स्पष्ट करता है कि दुनिया की नज़र में विद्रोही या रिंद होने के बावजूद इश्क़ में डूबे लोग हीन नहीं, बल्कि अद्वितीय और सूर्य-चंद्रमा की तरह चमकदार होते हैं।
Source: rekhta · HI
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1
इश्क़ में ला-जवाब हैं हम लोग
माहताब आफ़्ताब हैं हम लोग
2
गरचे अहल-ए-शराब हैं हम लोग
ये न समझो ख़राब हैं हम लोग
3
शाम से आ गए जो पीने पर
सुब्ह तक आफ़्ताब हैं हम लोग
4
हम को दावा-ए-इश्क़-बाज़ी है
मुस्तहिक़्क़-ए-अज़ाब हैं हम लोग
5
नाज़ करती है ख़ाना-वीरानी
ऐसे ख़ाना-ख़राब हैं हम लोग
6
हम नहीं जानते ख़िज़ाँ क्या है
कुश्तगान-ए-शबाब हैं हम लोग
7
तू हमारा जवाब है तन्हा
और तेरा जवाब हैं हम लोग
8
तू है दरिया-ए-हुस्न-ओ-महबूबी
शक्ल-ए-मौज-ओ-हबाब हैं हम लोग
9
गो सरापा हिजाब हैं फिर भी
तेरे रुख़ की नक़ाब हैं हम लोग
10
ख़ूब हम जानते हैं अपनी क़द्र
तेरे ना-कामयाब हैं हम लोग
11
हम से ग़फ़लत न हो तो फिर क्या हो
रह-रव-ए-मुल्क-ए-ख़्वाब हैं हम लोग
12
जानता भी है उस को तू वाइ'ज़
जिस के मस्त-ओ-ख़राब हैं हम लोग
13
हम पे नाज़िल हुआ सहीफ़ा-ए-इश्क़
साहिबान-ए-किताब हैं हम लोग
14
हर हक़ीक़त से जो गुज़र जाएँ
वो सदाक़त-मआब हैं हम लोग
15
जब मिली आँख होश खो बैठे
कितने हाज़िर-जवाब हैं हम लोग
16
हम से पूछो 'जिगर' की सर-मस्ती
महरम-ए-आँ-जनाब हैं हम लोग
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