રૂપ સુગંધી હું કાંઈ નો જાણું ડુંગરાનો ગોવાળ! આવળ, બાવળ, આકડા કેરી કાંટ્યમાં આથડનાર. – મારે...

“Of beauty or sweet scent, I know naught,A mountain shepherd, by harsh life taught!Through thorny thickets of Aaval, Baaval, Aakada I stray,Where I wander, my home for the day. – To me...”

— ज़वेરचंद मेघानी
अर्थ

मैं एक पहाड़ी चरवाहा हूँ, जो सौंदर्य या सुगंध के बारे में कुछ नहीं जानता, क्योंकि मैं आवळ, बावळ, आकड़ा जैसी कंटीली झाड़ियों में भटकता रहता हूँ।

विस्तार

पहाड़ों से आया एक विनम्र चरवाहा कहता है कि उसे बाहरी सुंदरता या मनमोहक सुगंध की कोई समझ नहीं है। उसकी दुनिया नाजुक फूलों से नहीं, बल्कि आँवल, बावल और आकड़ा जैसी कँटीली झाड़ियों से भरी है। वह अपने दिन इन काँटों भरे रास्तों में भटकते हुए, प्रकृति की कठोर वास्तविकताओं का सामना करते हुए बिताता है। यह दोहा एक साधारण, मजबूत व्यक्ति की तस्वीर खींचता है, जो अपने चुनौतीपूर्ण वातावरण से गहराई से जुड़ा है और अपने व्यावहारिक, मेहनती जीवन में दिखावे या परिष्कृत सुखों के लिए कोई जगह नहीं पाता। वह लचीलेपन से परिभाषित व्यक्ति है, न कि बाहरी आकर्षण से।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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पाठ
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