“Why are communities so absorbed, with all self-interest residing within themselves? From every land, let all come forth; we shall be servants to everyone!”
समुदाय अपने-अपने मार्गों में क्यों इतने मग्न हैं, जबकि सारा स्वार्थ उनके अपने भीतर ही समाया हुआ है? सभी देशों से सब कोई आओ, हम सभी के सेवक बनेंगे।
यह गहरा दोहा धीरे से पूछता है कि लोग अपनी-अपनी जातियों, पंथों और व्यक्तिगत स्वार्थों में क्यों उलझे रहते हैं। यह बताता है कि सभी स्वार्थी भावनाएँ हमारे भीतर गहराई से निहित हैं। फिर यह ज्ञान एक सुंदर निमंत्रण देता है: "सभी देशों से हर कोई आओ, और हम सब एक-दूसरे के सेवक बन जाएँगे।" यह एकता और निस्वार्थ सेवा के लिए एक शक्तिशाली आह्वान है। यह हमें विभाजन और व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठने के लिए प्रोत्साहित करता है, हमें विनम्रता अपनाने और सभी की भलाई के लिए खुद को समर्पित करने का आग्रह करता है, जिससे सार्वभौमिक भाईचारे और सामूहिक सेवा की भावना को बढ़ावा मिले।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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