“Yet never did the kheer run out!As if Mansarovar's waters, beyond all doubt.”
इसके बावजूद खीर कभी कम नहीं हुई, मानो वह मानसरोवर के अक्षय जल के समान हो।
यह प्यारा दोहा, 'तोय को दी' खूट्यां न खीर! जाणे मानसरोवरनां नीर,' घूघरो जी ने लिखा है। इसका अर्थ है कि 'खीर कभी खत्म ही नहीं हुई! मानो वह मानसरोवर का जल हो।' कल्पना कीजिए एक स्वादिष्ट खीर, जो कितनी भी खाई जाए, कभी कम ही न हो, हमेशा बनी रहे। इसकी तुलना पवित्र मानसरोवर झील के विशाल और शुद्ध जल से की गई है, जो एक अथाह और शुद्ध स्रोत का प्रतीक है। यह दोहा प्रचुर आशीर्वाद की भावना को दर्शाता है, जहाँ कोई अनमोल और आनंददायक वस्तु कभी समाप्त नहीं होती, बल्कि लगातार खुशी और संतोष प्रदान करती है।
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