દરિયા ગયા શોષાઈ? શું ઘન-નીર ખૂટ્યાં? શું આભ સૂરજ-ચંદ્રમાનાં તેલ ખૂટ્યાં?

“Have the oceans dried to naught? Have the clouds no more rain?Has the sky run out of oil for the sun and moon's bright reign?”

— ज़वेરचंद मेघानी
अर्थ

क्या समुद्र सूख गए हैं और बादलों का पानी खत्म हो गया है? क्या आकाश में सूर्य और चंद्रमा को प्रकाशित करने वाला तेल समाप्त हो गया है?

विस्तार

यह दोहा सशक्त बिंबों का उपयोग करके अलंकारिक प्रश्न पूछता है। कवि आश्चर्यचकित है कि क्या विशाल समुद्र सूख गए हैं, या क्या बादल, जो जीवनदायी वर्षा लाते हैं, उनमें पानी खत्म हो गया है। वह आगे पूछता है कि क्या आकाश में सूर्य और चंद्रमा, जो प्रकाश और ऊर्जा के स्रोत हैं, उनका "तेल" या सार समाप्त हो गया है। मूल रूप से, कवि गहरा अविश्वास और चिंता व्यक्त कर रहा है, यह सवाल कर रहा है कि कुछ इतना मौलिक या स्वाभाविक रूप से प्रचुर कैसे गायब हो सकता है या विफल हो सकता है। यह कहने का एक तरीका है, "जब जीवन और पोषण के स्रोत ही गायब हो रहे हों तो चीजें इतनी गलत कैसे हो सकती हैं?" यह एक अप्रत्याशित और गंभीर कमी पर गहरी निराशा व्यक्त करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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