है गराँ-सैर ग़म-ए-राहीला-ओ-ज़ाद से तू — अल्लामा इक़बाल

है गराँ-सैर ग़म-ए-राहीला-ओ-ज़ाद से तू कोह ओ दरिया से गुज़र सकते हैं मानिंद-ए-नसीम

“How can you pass through the mountains and rivers, oh dear traveler, with the sorrow of your departure, like a gentle breeze?”

— अल्लामा इक़बाल

अर्थ

हे प्रिय पथिक, तुम विदाई के गम के साथ पहाड़ों और नदियों से कैसे गुज़र सकते हो, जैसे एक हल्की हवा से गुज़रते हैं?

विस्तार

यह शेर इंसान की हिम्मत और हौसले को समझाता है। शायर, अल्लामा इकबाल, कहते हैं कि राहगीर का गम और ज़ात का गम, ये दोनों ही चीज़ें भारी नहीं हैं। क्यों? क्योंकि दिल में वो ताक़त है कि वो पहाड़ और नदियाँ भी पार कर सकता है, बिल्कुल हवा की सरसराहट की तरह। यह एक उम्मीद का पैगाम है, जो हमें बताता है कि कोई भी चुनौती, चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, हमारी हिम्मत के सामने टिक नहीं सकती।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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