अक़्ल अय्यार है सौ भेस बना लेती है — अल्लामा इक़बाल

अक़्ल अय्यार है सौ भेस बना लेती है इश्क़ बेचारा न मुल्ला है न ज़ाहिद न हकीम

“The clever mind takes a hundred disguises, But love, poor thing, is neither a scholar, nor a saint, nor a physician.”

— अल्लामा इक़बाल

अर्थ

अक़्ल एक चंचल और मायावी चीज़ है जो बहुत से रूप धारण कर लेती है, लेकिन प्यार (इश्क़) तो भोला है; वह न तो धार्मिक है, न संन्यासी है, और न ही वैद्य।

विस्तार

यह शेर हमें मन और इश्क़ की गहराई को समझाता है। शायर कहते हैं कि अक़्ल (बुद्धि) कितनी चंचल होती है, वह सौ रूप ले लेती है। लेकिन इश्क़... इश्क़ किसी नियम में बंधा नहीं है। न वह किसी धर्मग्रंथ (मुल्ला) से बंधा है, न वह तपस्या (ज़ाहिद) से, और न ही वह किसी दवा (हकीम) से समझाया जा सकता है। यह एक अलौकिक एहसास है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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