मीर-ए-सिपाह ना-सज़ा लश्करियाँ शिकस्ता सफ़ आह वो तीर-ए-नीम-कश जिस का न हो कोई हदफ़

“The army's spoils, O Mir-e-Sipah, are not worth the disgrace; / Ah, that arrow from the half-drawn bow, whose aim knows no limit.”

— अल्लामा इक़बाल
अर्थ

मीर-ए-सिपाह, तुम्हारे द्वारा लूटी गई सेना की संपत्ति, अपमान के लायक नहीं है; आह, वह अर्ध-तने हुए धनुष का तीर, जिसका कोई लक्ष्य नहीं है।

विस्तार

यह शेर बेकार मेहनत और दिशाहीन प्रयास की त्रासदी को बयां करता है। पहली लाइन में एक पराजित जनरल और अपमानित सेना का दृश्य है। लेकिन दूसरी लाइन सबसे गहरी है: वह आधा खींचा हुआ तीर जिसका कोई निशाना नहीं है। अल्लामा इकबाल इस तस्वीर का इस्तेमाल करके हमें बताते हैं कि सबसे बड़ी जंग युद्ध से नहीं, बल्कि प्रयास की दिशाहीनता से है। यह उद्देश्य की खोज का आह्वान है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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