न फ़क़्र के लिए मौज़ूँ न सल्तनत के लिए — अल्लामा इक़बाल
न फ़क़्र के लिए मौज़ूँ न सल्तनत के लिए
वो क़ौम जिस ने गँवाई मता-ए-तैमूरी
“Neither for poverty nor for the state's glory, That people who lost the might of the Timurids.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
न यह (कविता) गरीबी के लिए है और न ही यह (कविता) किसी राज्य की शान के लिए, बल्कि वह क़ौम जिसने तैमूरियों का तेज खो दिया।
विस्तार
यह शेर सिर्फ़ इतिहास की बात नहीं करता, बल्कि इंसान की रूह की बात करता है। शायर कहते हैं कि कोई क़ौम जब ग़रीबी या सल्तनत खोती है, तो असल नुक़सान वो नहीं होता। नुक़सान होता है अपनी उस शान, अपनी उस 'मता' का, जो उनके वजूद का हिस्सा थी। यह एक गहरा दर्शन है कि असली गिरावट किस चीज़ की होती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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