हुआ हरगिज़ न ख़त-ए-शौक़ का सामान दस्त-ए-आतिश — ख़्वाजा हैदर अली आतिश
“Never could the fire's hand prepare the means for passion's letter; The ink itself grew scarce, if ever we laid hold upon the pen.”
अर्थ
आतिश के हाथ से प्रेम-पत्र लिखने का सामान कभी नहीं जुट पाया; जब भी हमने क़लम उठाई, स्याही ही दुर्लभ हो गई।
विस्तार
शायर अपनी बेबसी पर हँसता है। जब भी वह अपने प्रेम का पत्र लिखने के लिए आख़िरकार क़लम हाथ में लेता है, तभी स्याही किसी तरह ग़ायब हो जाती है। जैसे पूरी दुनिया उसके ख़िलाफ़ हो। आतिश के हाथ को वह सामान कभी पूरा नहीं मिल पाता जो उसे चाहिए। क़लम मिलती है तो स्याही नहीं, स्याही होती है तो शायद क़लम गुम। इसमें एक हल्की, कड़वी-सी हँसी है, यह एहसास कि साधन और सही पल कभी एक साथ नहीं मिलते। यह बताता है कि चाहत और इरादा अक्सर रुकावटों से टकराते हैं, और प्रेम का वह पत्र हमेशा अनलिखा रह जाता है, दिल सही मौक़े का इंतज़ार करता रहता है।
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