तय किसतरह से होवे रह-ए-इश्क़ देखिए — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

तय किसतरह से होवे रह-ए-इश्क़ देखिए संग-ए-निशान का दख़्ल हो हमें न मील का

“Let us see just how the road of love is to be traversed— where neither milestone nor marker-stone holds sway for us.”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

देखें तो सही कि इश्क़ का रास्ता किस तरह तय हो, जबकि हमारे लिए न कोई मील का पत्थर है और न कोई निशानी का पत्थर।

विस्तार

शायर सोचता है कि इश्क़ का यह सफ़र आख़िर तय कैसे होगा। आम रास्ते पर मील के पत्थर और निशानियाँ होती हैं, जो बताती हैं कि आप कितनी दूर आ चुके हैं। मगर इश्क़ के रास्ते पर ऐसा कोई निशान नहीं, कोई मील का पत्थर नहीं जिससे फ़ासला नापा जा सके। शायर कहता है, देखें यह राह कैसे पूरी होती है, जब हमारे पास न कोई राह दिखाने वाला पत्थर है, न मील का कोई निशान। यह शेर इश्क़ में खो जाने का एहसास बहुत ख़ूबसूरती से बयान करता है—एक ऐसा सफ़र जिसका न नक़्शा है, न मंज़िल दिखती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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