गुल आते हैं बस्ती में अदम से ब-हमा-गोश — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

गुल आते हैं बस्ती में अदम से ब-हमा-गोश बुलबुल का ये नाला नहीं अफ़्साना हो उस का

“The roses come into the garden from non-being, all ears to listen; This is no mere lament of the nightingale—it is the telling of its tale.”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

फूल अस्तित्वहीनता से बस्ती में पूरी तरह कान लगाए हुए आते हैं; बुलबुल का यह विलाप नहीं, बल्कि उसी की कहानी है।

विस्तार

शायर एक सुंदर दृश्य रचते हैं। फूल अदम से, यानी उस दुनिया से जहाँ कुछ नहीं होता, बाग़ में आते हैं, और वे अपने सारे कानों को खोले हुए आते हैं, सुनने को उत्सुक। इतने ध्यान से क्यों? क्योंकि बुलबुल गा रही है। पर शायर कहते हैं कि यह कोई साधारण दर्द भरी पुकार नहीं है। बुलबुल का यह विलाप असल में एक कहानी है, ख़ुद फूल की दास्तान। इसलिए फूल झुककर अपनी ही कहानी सुनते हैं। यह एक कोमल छवि है कि सुंदरता और चाह हमेशा जुड़े रहते हैं, और गाने वाले के ग़म में भी महबूब की कहानी छिपी होती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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