हुई मंज़ूर मोहताजी न मुझको अपने सायल की — ख़्वाजा हैदर अली आतिश
“I could not bear my own beggar to stand in need of me; I turned the bowl of my skull upside down—a beggar's begging cup.”
अर्थ
मुझे यह मंज़ूर न हुआ कि मेरा अपना माँगने वाला मुहताज रहे, इसलिए मैंने अपने सिर की खोपड़ी को उलटा करके भीख माँगने का कासा बना दिया।
विस्तार
शायर यहाँ बड़े स्वाभिमान और आत्मसम्मान से बात करता है। वह कहता है कि उसने कभी किसी के सामने हाथ फैलाना या किसी देने वाले का मोहताज बनना गवारा नहीं किया। उसे किसी के दरवाज़े पर भिखारी बनना मंज़ूर नहीं था। इसके बजाय उसने अपने ही सिर को उल्टा करके उसे अपना भीख का कटोरा बना लिया। यानी वह सिर्फ़ अपने आप पर भरोसा करता है। जो कुछ चाहिए, वह अपने ही भीतर से माँगता है, बाहर की दुनिया से नहीं। यह आत्मनिर्भरता, गरिमा और किसी के आगे न झुकने का सुंदर चित्र है। वह दूसरों से मदद माँगने के बजाय अपनी ही रिक्तता को अपनाना बेहतर समझता है।
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