तअल्लुक़ रूह से मुझको जसद का नागवारा है — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

तअल्लुक़ रूह से मुझको जसद का नागवारा है ज़माने में चलन है चार दिन की आश्नाई का

“The soul's bond with the body is distasteful to me; in this world the fashion is a friendship of but four short days.”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

मुझे आत्मा का शरीर से जुड़ाव पसंद नहीं है; इस दुनिया में तो चार दिन की जान-पहचान का ही रिवाज है।

विस्तार

शायर कहते हैं कि रूह का शरीर से जुड़ाव उन्हें अच्छा नहीं लगता, और इसकी वजह भी बताते हैं। इस दुनिया का दस्तूर यही है कि कोई भी पहचान, कोई भी दोस्ती बस चार दिन की होती है, बहुत थोड़े समय की। इसलिए रूह और जिस्म भी दो साथी हैं जो कुछ पल के लिए मिलते हैं, फिर बिछड़ जाते हैं। रूह उस चीज़ से ज़्यादा लगाव नहीं रखना चाहती जिसे जल्द छोड़ना है। इसमें एक हल्की उदासी है, मगर स्वीकार भी है। यह याद दिलाता है कि हमारी हर चीज़ अस्थायी है, और जीवन के सबसे करीबी रिश्ते भी बस छोटी-सी मुलाक़ात हैं।

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