“Where could these carefree children find salt to sprinkle on my wound? What sheer delight it would have been had stones contained salt too!”
ये बेपरवाह बच्चे मेरे ज़ख़्मों पर छिड़कने के लिए नमक कहाँ से लाएँ? कितना मज़ा आता अगर पत्थरों में भी नमक होता!
मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर इश्क़ के दीवानेपन और दर्द की इंतिहा को बड़े ही अनोखे और दिलकश अंदाज़ में बयां करता है। रिवायत के मुताबिक जब गली के मासूम बच्चे दीवाने आशिक़ पर पत्थर फेंकते हैं, तो उसके जिस्म पर गहरे ज़ख़्म हो जाते हैं। ग़ालिब को इस बात का मलाल है कि काश इन पत्थरों में ही नमक होता, ताकि चोट लगते ही ज़ख़्मों पर नमक भी छिड़क जाता और तड़प का लुत्फ़ दोगुना हो जाता! यह आशिक़ की उस कैफ़ियत को दिखाता है जहाँ दर्द सहना ही उसका सबसे बड़ा सुख बन जाता है।
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