ग़ज़ल
याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे
یاد ہے شادی میں بھی ہنگامۂ یا رب مجھے
यह ग़ज़ल शायर की गहरी आंतरिक बेचैनी को दर्शाती है, जहाँ खुशी के अवसर भी आध्यात्मिक तड़प और एक छिपी मुस्कान से युक्त होते हैं। यह अभिव्यक्ति की मुक्तिदायक शक्ति और अधूरी इच्छाओं में सांत्वना पाने के विरोधाभासी स्वभाव का वर्णन करती है, यहाँ तक कि कवि बंदियों के आराम से भी ईर्ष्या करता है। शायर का हृदय हसरत के सुखों की ओर आकर्षित है, जहाँ इच्छा का टूटना ही उसका वास्तविक अर्थ बन जाता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे
सुब्हा-ए-ज़ाहिद हुआ है ख़ंदा ज़ेर-ए-लब मुझे
मुझे खुशी के पलों में भी अपनी 'या रब' की पुकार याद आती है; ज़ाहिद की सुबह मेरे लिए अब होंठों तले की हंसी बन गई है।
2
है कुशाद-ए-ख़ातिर-ए-वा-बस्ता दर रहन-ए-सुख़न
था तिलिस्म-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद ख़ाना-ए-मकतब मुझे
मेरे बंधे हुए मन का खुलना या विकास वाणी के अधीन है। मेरे लिए, पाठशाला वर्णमाला के अक्षरों के एक बंद तिलिस्म के समान थी।
3
या रब इस आशुफ़्तगी की दाद किस से चाहिए
रश्क आसाइश पे है ज़िंदानियों की अब मुझे
हे प्रभु, इस अव्यवस्था के लिए मैं किससे न्याय मांगू? अब तो मुझे कैदियों के आराम पर भी ईर्ष्या होती है।
4
तब' है मुश्ताक़-ए-लज़्ज़त-हा-ए-हसरत क्या करूँ
आरज़ू से है शिकस्त-ए-आरज़ू मतलब मुझे
मेरी प्रकृति हसरत की लज़्ज़तों की इच्छुक है, मैं क्या करूँ? मुझे अपनी आरज़ू से ही आरज़ू का नाश मक़सद है।
5
दिल लगा कर आप भी 'ग़ालिब' मुझी से हो गए
'इश्क़ से आते थे माने' 'मीरज़ा' साहब मुझे
ऐ ग़ालिब, दिल लगाकर आप भी मुझ जैसे ही हो गए। ऐ मिर्ज़ा, मुझे तो इश्क़ से ही अर्थ और अंतर्दृष्टि प्राप्त होती थी।
6
सुब्ह ना-पैदा है कुल्फ़त ख़ाना-ए-अदबार में
तोड़ना होता है रंग-ए-यक-नफ़स हर शब मुझे
दुख और बदकिस्मती के इस घर में सुबह का कोई निशान नहीं है। हर रात मुझे एक साँस का रंग तोड़ना पड़ता है।
7
शूमी-ए-ताले' से हूँ ज़ौक़-ए-मआसी में असीर
नामा-ए-आ'माल है तारीकी-ए-कौकब मुझे
मैं अपने बुरे भाग्य के कारण पापों के आनंद में कैद हूँ। मेरे कर्मों की किताब मेरे लिए एक तारे की कालिमा के समान है।
8
दर्द-ए-ना-पैदा-ओ-बे-जा तोहमत-ए-वारस्तगी
पर्दा-दार यावगी है वुसअत-ए-मशरब मुझे
मेरा अप्रकट दर्द वैराग्य का एक बेबुनियाद आरोप प्रतीत होता है। मेरी व्यापक सोच मेरे पागलपन को छिपाती है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
