उस फ़ित्ना-ख़ू के दर से अब उठते नहीं 'असद' — मिर्ज़ा ग़ालिब
उस फ़ित्ना-ख़ू के दर से अब उठते नहीं 'असद'
उस में हमारे सर पे क़यामत ही क्यूँ न हो
“Asad, from the door of that mischief-maker, I rise no more,Even if doomsday itself upon my head were to pour.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
असद, मैं अब उस शरारती व्यक्ति के दरवाज़े से नहीं हटूँगा, भले ही वहाँ मेरे सर पर क़यामत ही क्यों न आ जाए।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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