“My livelihood was drawn, O Asad, from the wounds of my heart, before the temple of fire became the salamander's fiefdom.”
ऐ असद, मेरे जिगर के दाग़ों से मेरी गुज़र-बसर उस समय भी जारी थी, जब आतिश-कदा समंदर (आग के जीव) की जागीर भी नहीं बना था।
ग़ालिब यहाँ बड़े अनोखे अंदाज़ में अपने दर्द और ज़ख्मों की क़ीमत बता रहे हैं। वे 'समुंदर' यानी आग में ज़िंदा रहने वाले पौराणिक जीव का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि आग का घर तो बाद में उस जीव की जागीर बना, उससे बहुत पहले से मेरा गुज़ारा मेरे दिल के सुलगते दाग़ों की बदौलत चल रहा था। यानी उनका रंज-ओ-ग़म कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह तड़प और आग ही हमेशा से उनकी ज़िंदगी और शायरी की असल पूँजी रही है।
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