ग़ज़ल
सद जल्वा रू-ब-रू है जो मिज़्गाँ उठाइए
صد جلوہ روبرو ہے جو مژگاں اٹھائیے
यह ग़ज़ल महबूब या ईश्वर की अत्यधिक उपस्थिति को दर्शाती है, जहाँ अनगिनत नज़ारे सामने हैं, पर उन्हें देखने या समझने की शक्ति का अभाव है। यह इश्क़ के जुनून को पालने की कठिनाइयों, एहसानों के बोझ और ईर्ष्या के घावों को छिपाने या छिपी हुई मुस्कान का पर्दा उठाने के मार्मिक अनुरोध की पड़ताल करती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
सद जल्वा रू-ब-रू है जो मिज़्गाँ उठाइए
ताक़त कहाँ कि दीद का एहसाँ उठाइए
अगर आप अपनी पलकें उठाएँ, तो सौ नज़ारे सामने हैं। इस दर्शन के एहसान को उठाने की ताक़त कहाँ?
2
है संग पर बरात-ए-मआश-ए-जुनून-ए-इश्क़
या'नी हुनूज़ मिन्नत-ए-तिफ़्लाँ उठाइए
इश्क़ के जुनून की जीविका पत्थरों पर है; यानी अभी भी बच्चों की मिन्नतें उठानी पड़ती हैं।
3
दीवार बार-ए-मिन्नत-ए-मज़दूर से है ख़म
ऐ ख़ानुमाँ-ख़राब न एहसाँ उठाइए
दीवार मज़दूर के एहसान के बोझ से झुकी हुई है। ऐ ख़ानुमाँ-ख़राब, और एहसान मत उठाइए।
4
या मेरे ज़ख़्म-ए-रश्क को रुस्वा न कीजिए
या पर्दा-ए-तबस्सुम-ए-पिन्हाँ उठाइए
या तो मेरी ईर्ष्या के घाव को उजागर न करें, या फिर उस छिपी हुई मुस्कान से पर्दा उठा दें।
5
दिल ही नहीं कि मिन्नत-ए-दरबाँ उठाइए
कस को वफ़ा का सिलसिला जुम्बाँ उठाइए
यह सिर्फ मेरा दिल ही नहीं है जिसे दरबान का एहसान उठाना पड़े; तो फिर वफ़ा का सिलसिला किसे पेश किया जाए?
6
ता-चंद दाग़ बैठिए नुक़साँ उठाइए
अब चार-सू-ए-'इश्क़ से दूकाँ उठाइए
कब तक हम दाग़ सहते रहेंगे और नुक़सान उठाते रहेंगे? अब इस इश्क़ के बाज़ार से अपनी दूकान उठा लीजिए।
7
हस्ती फ़रेब-नामा-ए-मौज-ए-सराब है
यक 'उम्र नाज़-ए-शोख़ी-ए-उनवाँ उठाइए
अस्तित्व एक धोखेबाज दस्तावेज़ है, जैसे मृगतृष्णा की लहर। एक पूरे जीवन भर इसके आरम्भ की चंचल घमंड को सहना पड़ता है।
8
ज़ब्त-ए-जुनूँ से हर सर-ए-मू है तराना-ख़ेज़
यक नाला बैठिए तो नयस्ताँ उठाइए
पागलपन को रोकने पर भी, हर बाल की नोक से गीत फूटते हैं। केवल एक आह भरने से आप पूरे नयस्ताँ को जगा सकते हैं।
9
तर्ज़-ए-ख़राश नाला सरिश्क-ए-नमक-असर
लुत्फ़-ए-करम बदौलत-ए-मेहमाँ उठाइए
मेरा विलाप एक खरोंच की शैली में है, मेरे आँसू नमक की तरह असरदार हैं। इस मेहमान के कारण अपनी कृपा और दया दिखाइए।
10
अंगूर-ए-स'ई बे-सर-ओ-पाई से सब्ज़ है
'ग़ालिब' ब-दोश-ए-दिल ख़ुम-ए-मस्ताँ उठाइए
कोशिश का फल भले ही बे-सर-ओ-पा या बेमानी लगे, फिर भी वह हरा-भरा है। ऐ ग़ालिब, दिल के कंधे पर प्रेमियों का मद-भरा घड़ा उठा लो।
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