ग़ज़ल
क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
قیامت ہے کہ سن لیلیٰ کا دشت قیس میں آنا
इस ग़ज़ल में ग़ालिब ने माशूक़ की मासूमियत और इश्क़ की शिद्दत के प्रति उसकी बेपरवाही को बड़े अंदाज़ से पेश किया है, जो लैला के मजनूँ के पास जाने पर भी हैरान होता है। शायर नाज़ुक दिल पर तरस खाते हुए प्रेम की कठिन आज़माइशों और जज़्बातों की नाज़ुकी को उजागर करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
तअ'ज्जुब से वो बोला यूँ भी होता है ज़माने में
यह कितनी हैरान कर देने वाली बात है कि लैला के क़ैस (मजनूँ) के जंगल में आने की ख़बर सुनकर वह अचरज से बोल उठा, "क्या दुनिया में ऐसा भी कभी होता है?"
2
दिल-ए-नाज़ुक पे उस के रहम आता है मुझे 'ग़ालिब'
न कर सरगर्म उस काफ़िर को उल्फ़त आज़माने में
हे ग़ालिब, मुझे उसके नाज़ुक दिल पर तरस आता है; उस महबूब को प्यार आज़माने के लिए मत उकसाओ।
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