ग़ज़ल

फिर इस अंदाज़ से बहार आई

پھر اس انداز سے بہار آئی
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: पाई

यह ग़ज़ल बसंत के आगमन का जश्न मनाती है, जिसकी शोभा इतनी अद्भुत है कि सूर्य और चंद्रमा भी उसके दर्शक बन जाते हैं। इसमें वर्णित है कि कैसे पृथ्वी सिर से पैर तक सज जाती है और नीले आकाश के समान मनमोहक बन जाती है। हर जगह हरियाली इतनी प्रचुर है कि वह पानी की सतह पर भी काई बनकर छा जाती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
फिर इस अंदाज़ से बहार आई कि हुए मेहर-ओ-मह तमाशाई
बसंत फिर से इतनी शान से आया है कि सूर्य और चंद्रमा भी उसे देखने वाले बन गए हैं।
2
देखो ऐ साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक इस को कहते हैं आलम-आराई
देखो, हे पृथ्वी पर रहने वालों, इसे ही संसार की सजावट कहते हैं।
3
कि ज़मीं हो गई है सर-ता-सर रू-कश-ए-सतह-ए-चर्ख़-ए-मीनाई
पूरी पृथ्वी नीले आकाश की सतह की प्रतिद्वंद्वी बन गई है।
4
सब्ज़ा को जब कहीं जगह न मिली बन गया रू-ए-आब पर काई
जब सब्ज़े को कहीं जगह नहीं मिली, तब वह पानी की सतह पर काई बन गया।
5
सब्ज़ा ओ गुल के देखने के लिए चश्म-ए-नर्गिस को दी है बीनाई
हरे-भरे सब्ज़े और फूलों को देखने के लिए, नरगिस की आँख को देखने की शक्ति प्रदान की गई है।
6
है हवा में शराब की तासीर बादा-नोशी है बादा-पैमाई
हवा में ही शराब का नशा मौजूद है। इसलिए, शराब पीना केवल उसे नापने जैसा है।
7
क्यूँ न दुनिया को हो ख़ुशी 'ग़ालिब' शाह-ए-दीं-दार ने शिफ़ा पाई
हे ग़ालिब, दुनिया क्यों न खुश हो, क्योंकि धर्मनिष्ठ राजा को शिफ़ा मिल गई है।
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