“Ghalib, his stature transcends imagination's thought, It is the humility of devotion that I call Ali 'God'.”
ग़ालिब (मैं) कल्पना की समझ से कुछ परे हूँ। यह मेरी बंदगी की लाचारी है कि मैं अली को ख़ुदा कहूँ।
'ग़ालिब' है रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर से कुछ परे, है इज़-ए-बंदगी कि 'अली' को ख़ुदा कहूँ। ग़ालिब की हैसियत हमारी कल्पना की समझ से कहीं आगे है। यह तो बस भक्त होने की मेरी विनम्रता या मजबूरी है कि मैं अली को ईश्वर नहीं कहता। रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर का मतलब है कल्पना से किसी के ऊंचे दर्जे को समझना, और इज़-ए-बंदगी का अर्थ है एक सेवक होने की लाचारी या सीमा। मेरे दोस्त, कभी-कभी हम किसी की महानता को देखकर इतने अभिभूत हो जाते हैं कि शब्द कम पड़ जाते हैं। ग़ालिब यहाँ हज़रत अली के प्रति अपना गहरा सम्मान दिखा रहे हैं। वे कहते हैं कि अली का दर्जा इतना ऊंचा है कि हमारी कल्पना वहां तक पहुँच ही नहीं सकती। ग़ालिब कह रहे हैं कि अगर मैं उन्हें भगवान नहीं कह रहा, तो यह सिर्फ इसलिए है क्योंकि मैं अपनी सीमाएं जानता हूँ। मैं एक इंसान हूँ, खुदा का बंदा हूँ, और यही नियम मुझे रोक लेते हैं। वरना अली का व्यक्तित्व और उनके काम इतने महान हैं कि वे किसी साधारण मनुष्य जैसे नहीं लगते। यह दिल और दिमाग की एक कशमकश है जहाँ दिल उन्हें सबसे ऊंचा देखना चाहता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी बहुत ऊंचे पर्वत को देखें और आपको लगे कि वह आकाश का ही हिस्सा है, जबकि आप जानते हैं कि वह ज़मीन से जुड़ा हुआ है। जब श्रद्धा अपनी चरम सीमा पर होती है, तो इंसान और ईश्वर के बीच का अंतर धुंधला पड़ने लगता है।
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